Dr. Munnawar Jasdanwala
परिचय
मुनव्वर जसदनवाला, राशीदा जसदनवाला और मनसूर जसदनवाला के पुत्र। वक्त का मुझे मालूम नहीं पर केलेंडर पर दिनांक छपी थी २२ जनवरी। जन्म के कुछ ही समय बाद एक पेन के सहयोग से डायरी के पन्नो पर शब्द नहीं हिंदुस्तान का भविष्य छप रहा था, अँग्रेजी भाषा मे कुछ इस तरह से लिखा था "स्टार ईस बोर्न"। नाम रखा था मुनव्वर, आसान भाषा मे मतलब कहू तो यू "एक अंधेरे कमरे मे उजाले की चमकती किरन"। पिता मनसूर जसदनवाला राजकोट के एक पुरातत्व शाखा के सरकारी दफ्तर के सामान्य कर्मचारी।
मुलाक़ात
शाम का वक्त था घड़ी की सुइया करीब ५ बजकर २० मिनिट को छूने की और थी, मे और रोनक रैया रोड से गुजर कर गुरु गोलवालकर मार्ग पर मुड़े। हम जा रहे थे हमारे एक करीबी मित्र हर्ष ने पता बताया था की चंदन मार्केट से ठीक ऊपर अँग्रेजी अच्छी शिखाई जाती हे। जगह का नाम जो मे बताने के लिए काफी तत्पर हु, "काफ्कास इंग्लिश कोर्नर"। क्लास के अंदर कदम रखने से पहले ही मेरी नज़र पड़ी तो चारो और तस्वीरे थी और ट्रॉफी और मेडल से भरी दिवारे। मेज पर एक कम्प्युटर जिसका मदरबोर्ड एक आधे लैपटाप और मॉनिटर था पुराने डिब्बे वाला। एक आधा साफ किया हुआ व्हाइट बोर्ड कोने मे किताबों का एक थप्पा। एक तलवार जो दीवार पर रखी गयी तलवार काफी असहज महसूस करती थी मुझे हालाकी मे क्लास के नाम के मतलब की जद्दोजहद से अभी उभर भी नहीं पाया था।
जैसे ही हम अंदर गए हमे खुर्शी मे बैठे एक शिक्षक ने अपने से कम उम्र के दो स्टूडेंट को बोले प्लीज इन लोगो को आप बैठने दोगे ? जी, क्लास स्टूडेंट्स से खचाखच भरा हुआ था। मे भी उसी के इंतज़ार मे था की कब कहा जाए बैठिए जैसे ही बेठे हम दोनों को हमारा नाम पूछा गया और फिर अभ्यास। जैसे ही कही मे अपने परिचय मे नाम बोलता हु प्रेम तभी मे सामने वाले के हाव भाव से जान लेता हु की वो इंसान दिलजला है या ज़िंदादिल। ये है मेरे नाम की वाइब्रेशनस, यहा पर हम मुनव्वर जसदनवाला के हावभाव को एक राज़ रखके ही आगे बढ्ना मुनासिब समझूँगा। दूसरी ही घड़ी मे हमे एक सफ़ेद कागज पकड़ाया और अपना इंटरोडकसन लिखने बोला फर्क ये था इसबार हावभाव हमारे नापे जा रहे थे। उस सफ़ेद कागज पर शब्द के साथ साथ मेरी खराब अँग्रेजी का भय भी अंकित हो रहा था अगली ही मिनिट पर जैसे एक चित्रकार अपने हाथो से ब्रश के स्ट्रोक लगता हे उसी तरह लाल श्याही से सफ़ेद कागज पर ब्लू शब्दो को घेर लिया और बोले "डोन्ट वरी"। हाला की मुझे रत्तीभर उस डोन्ट वरी पर विश्वास नहीं हो रहा था क्यो की पुराने सभी क्लास के शिक्षको ने मुझे यही दिलासा दिया था और ऊपर से मे १० वी और १२ वी मे अँग्रेजी मे फ़ेल। लेकिन इस बार मुलाक़ात सत्य के पुजारी गांधीजी को फॉलो करने वाले से हुई थी। अगले दो साल बाद जगह थी मुंबई , मेरे हाथ मे माइक था २००-३०० लोगो से भरा हुआ एक कॉलेज का हॉल था सामने थे आल इंडिया प्रॉफेशनल कॉंग्रेस के चेरमेन और भारत को यूनाइटेड नेशन मे रिप्रेसेंट कर चुके बुद्धिजीवी डॉ. शशि थरूर।

काफ्का
काफ्का माने क्या ? फ्रांज़ काफ्का, शायद। मेरी नज़र मे काफ्का मतलब जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय की वैचारिक शाखा, यहा की हवा मे बोलने की आज़ादी घूमती है, आलोचना घूमती है, जी आप नेहरू की भी आलोचना बेफिक्र कर सकते है। यहा पे शिखाया जाता है सच के साथ अड़े रहना, सच से करीब रहना। अगर आप तीस मार खा बन के किसी को मूर्ख बनाने का साहस जताते हो तो रेवोलविंग चेर पर बैठे गुरु जी आपको इतनी तेजी से कुछ सवाल दागते हे जितनी तेजी से रामानंद सागर की रामायण मे भगवान राम के तीर। अंतत: मीनू साहब के साहित्य और अङ्ग्रेज़ी के ज्ञान की कसौटी कर ना इतना मुनासिब हे जितना जहर को चखना। अगर आपका लहजा ठीक है या उम्र १८ से कम हे तो आप ५०० सवाल दागो कोई फिक्र नहीं।" कुछ" ब्रह्मराक्षश किस्म के लोग भी आते थे जो भड़कते थे गांधीजी की तस्वीर को देख कर और बदले के भाव से अजीबगरीब शक्ल बना के हर एक मुद्दे पर बोलते थे सर कुछ समझ नहीं आया। मीनू सर भी कहा पीछे हटनेवालोमे से थे ? बाई और सर को ७० प्रतिशत हिलाके इतनी विनम्रता से वो बोलते थे ओके और नए नए आसान तरीके और नए उदाहरण से बार बार समझाते जब तक दोनों को तसल्ली ना हो जाए।
डॉ.मुनव्वर जसदनवाला यानि डोकटरेट,मेरे लिए कागजी सर्टिफिकेट के डोकटरेट से बढ़कर एक डॉक्टर की तरह हे , सवाल उठेगा क्यो ? सब्र करो लिखता हु। काफ्का मे सिर्फ कागजी बाते नहीं ज़िंदगी जीने का सलीका भी शिखाया जाता हे। कैसे विनम्रता से बातचीत करना, समूहिक रूप से कैसे एक दूसरों से ताल मेल कर के कैसे आगे बढ़े और कैसे हमे लड़ना हे, लड़ना है ? जी हा यहा पे ये भी शिखाया जाता हे लड़ना। हर सुबह ३०x५० सेंटीमीटर ५-६ समाचार पत्र गुजराती भाषा मे लगभग हर घर मे गिरते थे खचाखच भ्रष्टाचार,रेप, हत्या,आत्महत्या, अकस्मात, साइबर क्राइम जैसे तमतमाते शब्दो के सामने अच्छे शब्द को रखना, जो रेगिस्तान मे पड़ी मछली की तरह झटपटाते थे हमारे समाज के बुजुर्गो को मिलने ताकि हमारे बुजुर्गो की पीढ़ी जिन्हों ने सन १९४७ मे आज़ादी के लिए खून बहाया, उन सारे हिंदुस्तानी भाई बहन से जिन्हों ने सपने बुने थे एक अच्छी शारीरिक और वैचारिक पीढ़ी की जो ले जाए भारत को नई ऊंचाइयों पर, क्यो की हम आज के दिन स्मार्टफोन मे वर्टीकल मोड मे या ५५ इंच के पतले दीवार पे चिपके टेलीविज़न मे सोफ़े मे कमर को लेटाए जो अमूल का अटरली बटरली डेलीसस या हाइ बेज़ मे बज रहा गाना "अपना टाइम आएगा" ये हमारा टाइम लाने का भी किसी ने सपना बुना होगा। हमारी जिंदगी खुशियो से अटरली बटरली करने का भी हमारे पूर्वजो का सपना रहा होगा। हमारी नयी पीढ़ी भी ये तई कर ले उन्हे करना क्या हे ? आप चाहे तो ५० हजार वाले जिम्मी चू पहन के ६ लाख के हार्ली डेविडसन पर ४ हजार वाले गॉगल्स लगाके ट्राफिक सिग्नल को तोड़ते हुए तेजी से धूल उड़ाते आप एक बवंडर खड़ा कर सकते हो पर कुछ ठोस नहीं दे पाते समाज को। अब ये आप पे निर्भर करता हे आप क्या चुनते हे समाचार पत्र के शब्द,लाइन या हेडलाइन और उनकी दिशा या अपनी आलस ? सिर्फ महसूस किए गए सिद्धांतो का कोई मूल्य नहीं हे सिद्धान्त जिये जाते हे ऐसा देश के प्रथम महिला प्रधानमंत्री मानते थे और ये डॉक्टर साहब सिद्धांतो पे जीते थे।
एक शक्स जो खादी के कपड़ो मे अपनी साइकल मे घूमता रहता हे एकदम भावुक किस्म का जो ज़रूरियात मंद लोगो को खाना,कपड़ा और ज्ञान बांटता हे, एक शक्स जो फिक्र करता है उस सरकारी स्कूल की बच्चे की जिसकी दायनी पैर के चप्पल का एक हिस्सा कटा हुआ है, एक शक्स जो रेल की पटरी के पास बसी छोटी धारावी मे बैठ जाता हे और पूछता हे उनकी आय कितनी हे उनके बच्चे क्या पढ़ते हे ? सादगी इतनी की नुक्कड़ के कोनो पर बनी चाय की टपरी हो तो बेजीजक बैठ के चाय पिता हे, नयी पीढ़ी के विचार को टटोलने के लिए उनके साथ कभी मेगी खा लेता हे तो कभी पानीपूरी भी। समाज के सारे तबक्कों के विचार जानने के लिए अक्सर वो नाई की छोटी सी केबिन मे बाल भी कटवाते थे और दूसरी और देखे तो वही शक्ष अक्सर पाया जाता था न्यूज़ रिपोर्टर के सामने अपनी राय देते हुए।
एक फोन
एक शाम मानो सूरज अभी पृथ्वी की दूसरी और रोशनी फैलाने गया ही था की मेरे सेलफोन की स्क्रीन ऑन हुई और फोन बजने लगा हर बार की तरह फोन पे एटीकेट्स को साइड लाइन करते हुए बोले तुम २० मिनिट मे क्लास पर आ जाओ मैंने भी हामी भर दी और सीधा पहोचा काफ्का, उन्हे रवि चोटाई ने जिम्मा दिया था बॉडी बनाने का इसी तरह रचना हुई रोटरी कम्यूनिटी कॉर्पस की और मुझे हल्की स्मित लिए मीनू सर बोले आप वाइस प्रेसिडेंट हे रोटरी कम्यूनिटी कॉर्पस के आप तैयार हे ? मैंने भी अपना सर बाई और मोड़ा ओर हामी भरी और ज़िम्मेदारी ली इसी तरह जय हासलपरा को सेक्रेटरी और परीक्षित को ट्रेसेरर की नियुक्ति की गयी। उस दिन जितनि खुशी मिली वो मेरे लिए एक सपने से कम नहीं थी उसी के ठीक २-३ महीने बाद हमारा रोटरी का शपथ समारोह था सबको जिम्मेवारी माइक पर दी जा रही थी और माइक पर खड़े शक्स और उनकी पत्नी मेरा नाम आते ही चोंक उठे थे क्यो की वो हमारे एक पुराने सहपाठी थे एक नामी संस्था मे हम साथ पढ़ते थे उस वक्त के जब मेरा घमंड ठीक मोदीजी की बहुमत की तरफ हाइ रेहता था और आत्मविश्वास और ज्ञान ठीक अटलजी की सरकार की तरह कभी भी गिर जाता था।
फिर क्या १ साल मे १२ प्रोजेक्ट करने थे और हमारे प्रेसिडेंट जसदनवाला ने हमे इतना निचोड़ दिया था की अगले ८ महीने मे ही तिलमिला गया और इस्तीफा दे मारा , और मेरा इस्तीफा खारिज कर दिया गया और प्रोजेक्ट पूरे करने को बोला गया था हालाकी हमने उस वक्त ३४ प्रोजेक्ट पूरे कर लिए थे जो करीब करीब तीन गुना थे बड़ी मुश्किल से १ साल पूरा किया ४८ प्रोजेक्ट के साथ शायद हमारे प्रेसिडेंट हमे तैयार कर रहे थे देश के चर्चित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस रफ्तार से काम कर रहे थे उनसे दो गुनी रफ्तार से काम करना। शायद वो हमे तैयार कर रहे थे दौड़ते हिंदुस्तान के साथ दौड़ने को या फिर टक्कर देने को, जो मेरी ज़िंदगी का एक तगड़ा सबक था।
Coming soon...
My Two Heroes Dr.Munnawar Jasdanwala and Mr. Jivan Kothariya-2
I never knew what my teaching has meant for you until I read this prose. I am pleased that at least I could be of some usefulness to you in your career. ‘May your life be useful’ were the words which my grandfather Shree Akbarali Jasdanwala said when I was born. I hope I could continue to be useful to more pupils. I wish you luck and happiness.
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